अब्रों का ग़म काले अब्रों को जाने क्या ग़म था या शायद मेरे ग़म पर रो रहे थे इन्हें देख-देख मेरा ग़म बढ़ रहा था मैं ख़्यालों की नदी में डूबती- उ…
और पढ़ेंमहबूब का पता मुझसे ग़र कोई पूछे मेरे महबूब का पता कहूँगी रहता है गुलशन की फ़िज़ाओं में महकाता है फूलों को बसकर हवाओं में मुझसे ग़र कोई …
और पढ़ेंआग जब राख के नीचे सुलगती आग भड़क उठती है तब सारी दुनिया की मदहोशी तड़प उठती है हर आँख जागकर तबाही की कहानी कह उठती है जिसमें सब कुछ ज…
और पढ़ेंक्या हो गए हम ? बेझिझक मेरे नज़दीक आओ तुम हमें पत्थर का बुत ही पाओगे जुदाई कुछ इतनी लम्बी रही अब किसी और ही मोड़ पे पाओगे जहाँ हम तन्हा ह…
और पढ़ेंUltimate हिंदी शायरी पीते तो यूँ भी थे रोज़ मैख़ाने में पर मज़ा कुछ और है मुफ़्त के पैमाने में कोई तस्वीर जो कर सकती इकरारे मोहब्बत …
और पढ़ेंरात रात रोती रही अपनी तन्हा ज़िंदगी पर देखकर चाँद तारों ने कहा उससे तू रोती है तन्हाई पर मगर तन्हा तू नहीं हम तेरे साथ हैं सदा साथ तेर…
और पढ़ेंए काश ! अगर मेरे पंख होते तो मैं उड़ती ऊँचे आसमान में और कभी धरती पर नहीं उतरती क्योंकि मैं जानती हूँ ये दुनिया कितनी ज़ालिम है किस…
और पढ़ेंसबसे बेहतरीन कविताएँ क्या है ये ? जब तू सामने होता है लगता नहीं तुझसे मोहब्बत है मुझे जब तू नहीं होता है लगता है तेरी ख़्वाहिश है …
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