Hindi Short Story- एक्सीडेंट
 

रात के साढ़े दस बज चुके थे लेकिन मेरे पति का कोई अता-पता नहीं था। बार-बार इनके मोबाइल पर फ़ोन करने पर सिर्फ फ़ोन रिंग हो रहा था लेकिन फ़ोन उठाया नहीं गया। मन में एक अजीब-सी बेचैनी हो रही थी। किचन में रात का खाना बनाते वक़्त कभी कोई चीज़ अपने आप गिर रही थी तो कभी कुछ हाथ से छूट कर गिर रहा था। पापा के लिए उबाले हुए दूध की कटोरी भी छलक गई। मन और आशंकित होने लगा। मेरे साथ ऐसा तब होता है जब मेरी परी बन चुकी मम्मी किसी अनहोनी की सूचना मुझे देने की कोशिश करती हैं। रात के दस बजे से सुबह के पाँच बजे तक दिल्ली में कोरोना महामारी की वजह से लॉक डाउन और कर्फ्यू लग जाता है। कहीं लेट होने की वजह से पुलिस वालों ने तो नहीं रोक लिया या चालान काट दिया हो? मेरी नन्ही-सी बिटिया भी आज बार-बार अपने पापा को याद करके अपनी दादी से कह रही थी कि पापा नहीं आए अभी तक। वो खुद ही पापा को बार-बार फ़ोन लगा रही थी और न उठाने पर निराश हो रही थी।  मेरे पति बाइक से ऑफिस जाते हैं। शायद बाइक चला रहे होंगे इसलिए फ़ोन नहीं उठा रहे। मेरा दिल बैठा जा रहा था। तभी दरवाज़े पर घंटी बजी।


मेरी बिटिया उछलकर कहने लगी कि पापा आ गए। माँ ने दरवाज़ा खोला। मैं किचन से बाहर निकली तो मेरे पति की हालत देखकर सकपका गई। उनके कपड़े फटे हुए थे, काला जीन्स धूल से सना हुआ था। हाथों पर रोडसाइड की मिट्टी लगी हुई थी और कोहनी से खून निकल रहा था। उन्होंने अपने बैग को कंधे से उतार कर एक तरफ रख दिया। मेरे सास-ससुर, मेरी बिटिया और मैं उनकी ये हालत देखकर डर गए। हमने सवालों की बौछार लगा दी। उन्होंने कहा, 'अरे कुछ नहीं, बस थोड़ा-सा गिर गए। किसी ने हमारी बाइक को पीछे से टक्कर मारी और बाइक रोडसाइड पर पड़े बजरी और पत्थरों पर घसिटती हुई दूर तक चली गई।' पापा के पूछने पर कि सब ठीक है उन्होंने हाँ में उत्तर दिया। और उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उनकी शर्ट को धीरे से उतार दूँ। धीरे-धीरे जब उनकी शर्ट उतारी तो देखा कि दोनों हाथों की कोहनियों में बुरी तरह से चोट और रगड़ लगी हुई थी और खून निकल रहा था। उन्होंने हमारे खौफज़दा चेहरों को देखकर कहा, 'चिंता करने की ज़रुरत नहीं है, मैंने टेटनस का इंजेक्शन लगवा लिया है और दवाई भी लाया हूँ। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं अपने हाथ में सोप लेकर उनके हाथ अच्छी तरह से धो दूँ। मैंने देखा कि उनकी बाईं हाथ की कलाई सूजी हुई थी और वो हाथ को ज्यादा हिला नहीं पा रहे थे। मैंने घबराते हुए कहा, 'आपकी कलाई की हड्डी शायद टूट गई है?' उन्होंने मेरी चिंता को भाँपते हुए कहा, 'नहीं शायद झटका आया है.. परेशान नहीं होना है।'  पापा के पूछने पर कि एक्सीडेंट कहाँ पर हुआ तो इनका जवाब सुनकर हमारे होश उड़ गए। एक्सीडेंट लक्ष्मी नगर में इनके ऑफिस के पास ही हुआ था जो हमारे घर से लगभग एक घंटे से ज्यादा दूर था। मेरे पति एक्सीडेंट होने पर बाइक से रोड़ी-पत्थर और बजरी पर दूर तक घिसटते चले गए और फिर उसी दर्द और तकलीफ में हिम्मत जुटा कर इतनी दूर पल्सर जैसी भरी बाइक घर तक चलाकर भी लाए। उनकी बाईं हाथ की कलाई में सूजन बढ़ती जा रही थी क्योंकि हड्डी टूटी हुई थी। माँ ने उन्हें खाना और दवाई खिला कर सुला दिया। लेकिन उनकी नींद असहनीय दर्द के कारण टूट रही थी। मैं पूरी रात भगवान् का धन्यवाद करती रही कि मेरे पति की जान बच गई थी। वरना पीछे से कोई बड़ी गाड़ी आ रही होती तो जाने क्या हो गया होता।


अगले दिन सुबह मैं अपने पति के साथ उनका एक्स-रे करवाने गई तो हड्डी टूटी हुई दिखी। मेरी ननद ने डॉक्टर रमणीक महाजन, जो मैक्स स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत में आर्थोपेडिक्स डिपार्टमेंट के डीन हैं उनसे अपॉइंटमेंट ली। उनके बाईं हाथ की कलाई की हड्डी को जोड़ने के लिए सर्जरी करनी थी। डॉक्टर रमणीक महाजन की फीस और हॉस्पिटल के खर्चे सुनकर पलभर को मेरी साँस ही रुक गई। दो लाख फीस का नाम सुनकर ही दिल बैठा जा रहा था। इस कोरोना महामारी के काल में मेरे अठारह साल के अनुभव के बावजूद मैं बेरोज़गार थी। मेरे पति को भी 30% कट कर ही तनख्वाह मिल रही थी। सेविंग के नाम पर कुछ भी नहीं बचा था। हमारा होम-लोन इ.एम.आई. पिछले 10 महीने से अदा नहीं की गई थी। दो पर्सनल लोन्स की इ.एम.आई. भी नहीं दे पाए थे। हेल्थ इन्शुरन्स भी न था। अपने भाई-बंधुओं से माँगना ठीक नहीं लग रहा था। किसी दोस्त या सहेलियों की मदद के लिए हम हाथ नहीं पसार सकते थे। पूरे दिन और रात मैं और मेरे पति इस अनकही उलझन को सुलझाने में मन ही मन व्यस्त थे।


ऐसे मुश्किल समय में मेरी ननद ने हमारी परिस्थिति को भाँपते हुए सुबह 6:30 बजे ही द्वारका से आकर अपने भाई को साथ लेकर मैक्स हॉस्पिटल, साकेत में एडमिट करवाया, सर्जरी करवाई, पूरे दिन और रात को उनके साथ ही रहीं। बिना कुछ खाए-पिए तब तक रहीं जब तक इनकी सर्जरी ठीक से हो नहीं गई और इनको ऑपरेशन-थिएटर से रूम में शिफ्ट नहीं कर दिया गया। मैं घर पर अपनी बिटिया और सास-ससुर की देखभाल में अपनी घबराहट को दबाती रही। 8 अप्रैल की रात को हुए इनके एक्सीडेंट के बाद से 12 अप्रैल को इनकी सर्जरी होने तक बहुत मानसिक तनाव में थे हम सभी। मेरी ननद 13 अप्रैल की दोपहर को नन्दोई जी के साथ मेरे पति को लेकर घर आईं। उन्होंने दो लाख का हॉस्पिटल का बिल चुका दिया था और सभी दवाइयाँ कैसे देनी हैं समझा रही थीं। इस कलयुग में जहाँ कोई किसी का नहीं है वहीँ सुषमा दीदी जैसे भी हैं जो अपने परिवार पर जान लुटाते हैं।  



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