अब्रों का ग़म काले अब्रों को जाने क्या ग़म था या शायद मेरे ग़म पर रो रहे थे इन्हें देख-देख मेरा ग़म बढ़ रहा था मैं ख़्यालों की नदी में डूबती- उ…
और पढ़ेंमहबूब का पता मुझसे ग़र कोई पूछे मेरे महबूब का पता कहूँगी रहता है गुलशन की फ़िज़ाओं में महकाता है फूलों को बसकर हवाओं में मुझसे ग़र कोई …
और पढ़ेंआग जब राख के नीचे सुलगती आग भड़क उठती है तब सारी दुनिया की मदहोशी तड़प उठती है हर आँख जागकर तबाही की कहानी कह उठती है जिसमें सब कुछ ज…
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